मुख्यतः चार भागों में बंटा अकलतरा का वोटिंग पैटर्न 

जोगी लडे़गें कि बसपा इस पर असमंजस ने ठिठका रखी है राजनीतिक बहस

दीगर पार्टियों की सारी रणनीति वर्तमान विधायक को प्रत्याशी मान बुनी गई है

अकलतरा में चार मुख्य क्षेत्र हैं जिनका वोटिंग पैटर्न परिणाम पर असर करता है | सीसीआई की स्थापना के बाद से ही औद्योगिक क्षेत्र का पैटर्न यहां दिखता है जो किसी एक दल को लगातार वोट निषिद्ध करता है | यह तरीका आज भी जारी है जबकि इसके जवाब में अकलतरा स्थानीय क्षेत्र मजबूती से कांग्रेस के साथ खड़ा हो गया ताकि उद्योग मानसिकता पर अंकुश बना रहे |जब अकलतरा परिवार विशेष पर आश्रित होने लगा तो बलौदा पहरिया खिसोरा पंतोरा क्षेत्र ने नयी संभावना खोजनी शुरु कर दी, अब वोटिंग एक दूसरे के विपरीत होने लगी, इसके अलग बिलासपुर अकलतरा मार्ग पर स्थित बड़े गांव नरियरा, किरारी से तिलई तक मिक्स बैग बन गया ताकि अकलतरा और बलौदा के पैटर्न पर निर्णायक मुहर की ताकत आ जाए, यही तरीका जर्वे हरदी से बलौदा तक के गांवों ने अपनाया| इस क्षेत्र की चार मुख्य सड़कों से ग्रामीण इलाकों की तरफ जाएं तो सड़क के दोनों किनारों पर अलग अलग पैटर्न मिलेंगे | जीतता वही है जो दो मुख्य सेंटर अकलतरा और बलौदा को छोड बाकी दो को साध ले | वे बड़े गांव जहां औसत वोटर 4 से 5 हजार है परिणाम को बदलने का माद्दा तो रखते ही हैं इसलिए कि यहां उद्योग की कॉलोनी कल्चर के साथ कस्बा, गांव और जंगल का भी भरपूर असर है |

यहां शिकार के शौकीन बरहा और हिरन का आखेट करते हैं तो लकड़ीचोर जंगल पर आफत हैं, यानि मछली बीजों में भ्रष्टाचार से भूखे मगरमच्छ ही मुंह बाये नहीं हैं बल्कि बिजली ठेकेदारों के साये में एशिया का सबसे बड़े पावर प्लांट को छाती पर धारे अकलतरा विधानसभा के मतदाता भी घनघोर अंधेरे में विकास के लिए मुंह बाए खडा़ है पर उसके हिस्से में ईधन के कोयले और प्लांट की चिमनियों की कालिख से भरी धूल के सिवा कुछ नही है | इधर राजनीतिक बाजीगरी चालू है जिसका उतार चढ़ाव फिलहाल भरपूर मनोरंजन दे रहा है

कांग्रेस में घात प्रतिघात से जड़ें हिली

कभी अजीत जोगी के छत्रछाया में फलते फूलते चुन्नीलाल साहू ने जोगी भरोसे एक बार नैया पार उतार ली है | पहली बार भी 28 सौ का अंतर हार का कारण रहा था क्योंकि सौरभ सिंह ने उनके सरपंच कार्यकाल को मुद्दा बनाकर बसपा के तमाम वोटरों को एकसूत्र में बांध लिया तथा व्यक्तिगत संपर्क कर दीगर वोट भी हथिया लिए | कम अनुभव और जोगी आश्रित राजनीति ने साहू को जीत से वंचित कर दिया | जोगी सतनामी वोटों में बिखराव नहीं कर सके | लेकिन दूसरी बार  जोगी ने चुन्नीलाल को टिकट भी दिलाया और बड़ी जीत मिली | इस बार बसपा 40 हजार से 17 हजार पर आ गई, ये वो दौर था जब जोगी का एससी वोटों पर प्रभाव चरम पर था

इस बार साहू के साथ कोई जनसैलाब जुटाने वाला आश्रय नही है ना ही उनका पुराना कुनबा है जो उनके लिए हाड़ तोड़ जतन कर सके | बेशक साहू का अनुभव बढ़ा है, उनकी टीम नयी और उत्साही तो है पर वोट बटोर ले यह कहा नहीं जा सकता |भूपेश बघेल के इर्द गिर्द परिक्रमा टिकट में मदद तो कर सकती है पर  स्थानीय छत्रप और घरानों से दूरी भारी पड़ सकती है |

बताया जा रहा है कि कांग्रेस के विभिन्न सर्वे में अकलतरा में जीत के अवसर औसत से नीचे है जिसकी काट प्रत्याशी बदलना ही दर्शाया गया है | पिछली बंपर जीत का कुशन भी अब दरकने लगा है, क्योंकि विधानसभा के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बुरी तरह पिछड़ने को भी कंसीडर किया जा रहा है | ऐसे हालात में कांग्रेस से भी कई नाम उभर रहे हैं जिनमें स्व राकेश सिंह की धर्मपत्नी एवं उनके पुत्र राघवेंद्र सिंह , पूर्व जिलाध्यक्ष मंजू सिंह  नपा अध्यक्ष खुलन सोनवानी  एनएसयूआई के अंकित सिसोदिया, भविष्य चंद्राकर शामिल हैं इनके अलावा बिलासपुर से भी कई बड़े नाम अकलतरा की पृष्ठभूमि होने की वजह से सामने आ रहे हैं | इन सब में  राघवेंद्र सिंह सबसे सशक्त एवं स्वाभाविक नाम है | बलौदा क्षेत्र से भी कई नाम सामने आ तो रहे हैं पर टिकट की लंबी प्रक्रिया में जल्दी गुम भी हो रहे हैं |

जोगी – बसपा – आप और कई प्रभावशाली नाम

चतुष्कोणीय मुकाबले की दशा में जीत के लिए आवश्यक औसत वोटों की गणना सभी कर रहे हैं | लगभग दो लाख मतदाताओं में 80 फीसद मतदान का अनुमान है | यानि लगभग डेढ लाख मत, तब जीत के आवश्यक वोटो का औसत 55 से 60 हजार के बीच ठहरता है | ये संख्या कांग्रेस के अतिरिक्त सभी दलों के लिए परेशानी का सबब बन गया है | भाजपा  50 का आंकड़ा नहीं छू पाई है ना ही बसपा 45 तक पहुंची है  जनता कांग्रेस और आप तो यहां पहली बार सामने हैं |

इधर समस्या गठजोड़ को लेकर भी है, अकलतरा में जोगी प्रभाव जनपद पंचायत से लेकर कॉलेज चुनाव तक सर चढ़कर बोला है | जोगी के आभामंडल के सहारे संदीप यादव सहित कई दावेदार तैयार और जीत के आश्वस्त मुद्रा में थे| गठजोड़ में सीट बसपा के खाते में गई | पुराने आंकड़ों के कारण इसे सुप्रीमो नकार भी नहीं सके और विनोद शर्मा की दावेदारी पुख्ता हो गई |अब नये समीकरणो के साये में ऋचा जोगी का नाम सामने लाया जा रहा है | इस उहापोह ने बहस को भी अल्प विराम दे रखा है | मुकाबले में चौथा कोण आप के चंद्रहास देवांगन हैं | दिल्ली सरकार में मंत्री और आप के आंकडेधारित संगठन प्रभारी आमद बनाए हुए हैं वैसे सारा जोर दमदार उपस्थिति दिखाने तक सीमित है

विकल्प के रुप में नोटा और आप दोनों की मौजूदगी मतदाताओं को आकर्षित कर सकती है| इन सारे आंकड़ों और कलाबाजियों के बीच प्रबुद्घ वर्ग में राहुल सिंह और अरुण राणा के नाम भी चर्चा में हैं | कभी मप्र की राजनीति में रसूख रखने वाले इस क्षेत्र ने लंबे समय से अजीब सी मायूसी महसूस की जा रही है,

इस बार मंत्रीमंडल में अकलतरा को प्रतिनिधित्व दिलाने का अंडर करंट भी है यह भी महसूस किया जा रहा है कि इसके लिए गंभीर और विद्वान नेतृत्व चाहिए |इस विचारधारा में पुरातत्वविद राहुल सिंह और अरुण राणा के नाम  जनसामान्य की चर्चा में है |

गर आंकड़ों पर वापस लौटें तो जीत के लिए आवश्यक 55 हजार के औसत वोट संख्या को और नीचे लाकर ही अन्य दल दौड़ में रह सकते हैं | इसके दो रास्ते हैं पहला या तो वोटिंग प्रतिशत कम होकर 60-65 के आसपास आ जाए या चारों प्रमुख दलों को 30 हजार से ज्यादा मत आवश्यक रुप से मिले | इसमें भाजपा कांग्रेस और बसपा जोगी गठबंधन तो वोट जुटा लेंगे पर आप का आंकड़ा 30 हजार के आसपास का नहीं बन रहा है ना ही पूर्व नौकरशाह चंद्रहास देवांगन ये करिश्मा कर सकते हैं, वे पहले भी आजमाइश में उतर कर देख चुके हैं | आप को व्यवस्था परिवर्तन के एजेंडे में बहुत मेहनत करनी पडेगी जो इस बार वोट में बदल सके ऐसे संकेत नहीं हैं | परिस्थितियों के अनुसार परिणाम का आकलन वोटिंग प्रतिशत के अनुसार ही संभव है | बंपर वोटिंग फिर कांग्रेस के जीत की राह बना सकती है हालांकि सारा अंक गणित प्रत्याशी धोषणा के बाद ही स्पष्ट हो पायेगा |अगर तीसरी बार भी कांग्रेस प्रत्याशी वही रहता है तो इस बार व्यक्तिगत आरोपों पर धारदार जवाब ढूंढना आवश्यक होगा |

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