राहुल गांधी की तरह देश भर में चर्चा का विषय थे शिवभक्त रामलाल भी

विस का साक्षरता प्रतिशत का औसत देश के औसत से ज्यादा 

हर बार अप्रत्याशित परिणाम वाले अकलतरा का क्या है मिजाज? 

एक नगर पालिका एक नगर पंचायत और 124 गांव में 96 हजार महिला मतदाता के साथ 1.98 लाख से ज्यादा मतदाताओं वाले अकलतरा विधानसभा क्षेत्र में इस बार खंदक की लड़ाई है| जिले के किसी विधानसभा में हो ना हो अकलतरा में चतुष्कोणीय संघर्ष तय है|

कांग्रेस को भाजपा के साथ आम आदमी पार्टी और बसपा – जनता कांग्रेस की तगड़ी चुनौती मिलने वाली है | अब तक आप ने ही अधिकृत प्रत्याशी की घोषणा की है |बसपा से विनोद शर्मा प्रत्याशी के रुप में चुनाव प्रचार कर रहे हैं जबकि कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशी चयन के लिए माथापच्ची कर रही है |

अकलतरा कुछ माह पूर्व सुर्खियों में तब आया था जब मुलमुला भाजपा मंडल के अध्यक्ष रामलाल कश्यप तांत्रिक सी वेशभूषा में विधानसभा परिसर जा पहुंचे और विधानसभा की मिट्टी को अमरनाथ ले जाकर भाजपा की छत्तीसगढ़ में चौथी बार सरकार बनाने के लिए सिद्ध करने का दावा कर दिया 

शिवभक्त कश्यप तो अपनी रोज की सामान्य वेशभूषा में ही विधानसभा गये थे पर यही वेशभूषा सबको अचरज में डाल गई, यानि चौंकाना जैसे अकलतरा की नियति बन चुकी है | टिकट वितरण हो या चुनाव परिणाम इस विधानसभा में पूर्वानुमान ध्वस्त कर असामान्य निर्णय की परंपरा बन गई है | तभी तो मतदाता हर बगावत पर अपनी मुहर लगा देते हैं और यहां की माटी यह सिद्ध कर देती है भारत की आजादी की लड़ाई में जगा जागरुकता का अलख आज भी दीप्त है | मतदाताओं ने अपने निर्णय से किसी भी सिद्ध राजनेता को रास्ते पर लाने में कसर नहीं छोड़ी है | रियासती सियासत हो या आम आदमी की राजनीति यहां सबको सेवा का बराबर मौका मिला है | देश की दोनों बड़ी पार्टियों को टिकट बंटवारे में जनता की मंशा की उपेक्षा का कड़ा सबक भी सिखाया है | यहां से बागी जवाहर दुबे भी जीते हैं तो बसपा से सौरभ सिंह भी सफल रहे हैं दोनो ही बार कांग्रेस भाजपा हारी है| इसी मिजाज के चलते यहां टिकट वितरण सामान्य से ज्यादा पेचीदा होता है

भाजपा के 65+ में नहीं अकलतरा ?

मिशन भाजपा ने 65+ का बनाया तो है पर विरोधी दल की माने तो अकलतरा इसमें शामिल नहीं है | मजे की बात तो यह भी है कि भाजपा भी इस पर कोई दावा नहीं करती दिखी है |

अब हालात ये हैं कि भाजपा में दर्जन भर से ज्यादा उम्मीदवार हैं, इसमें रामलाल कश्यप भी शामिल हैं, पूर्व विधायक छतराम देवांगन फिर लॉबिंग तो कर रहे हैं पर अपने बजाय परिवार पर फोकस है | पिछले चुनावों में रिकॉर्ड मत पाकर भी खेत रहे दिनेश सिंह फिर से दम ठोंक रहे हैं तो प्रदीप सोनी भी लालायित हैं लेकिन खुलकर नहीं आ रहे हैं, रमेश वैष्णव और इमरान खान भी अच्छे विकल्प हैं , इमरान क्षेत्र में भाजपा का चेहरा हैं और नगरपालिका में दो दशक से अविजित पारी खेल रहे हैं | इमरान इसलिए भी पीछे होते हैं कि वे भी तमाम दलों से होते हुए भाजपा तक आए हैं और नपा की राजनीति में सभी दलों से दोस्ती रखते हैं |छतराम की ऊंगली पकड़ अमर से गौरीशंकर तक आका बदलते रहे हैं,

दिनेश सिंह इस बात को पार्टी तक पहुंचाने में लगे हैं कि दूसरी बार में जनता जीत के द्वार खोल देती है लेकिन अंदरुनी हालात बताते हैं कि पार्टी जातिवाद के तानेबाने में बुरी तरह उलझ गई है , फैसला दो ही नामों पर टिक रहा है| कल्याणी साहू या सौरभ सिंह |

पूर्व बसपा विधायक सौरभ कांग्रेस से बसपा, बसपा से कांग्रेस फिर कांग्रेस से भाजपा तक पहुंचे हैं पार्टी में ही उनके मुखर विरोधी कहते हैं कि उनकी परिक्रमा रुकने वाली नहीं है | इसलिये की उनका मिजाज भाजपा से मेल नहीं खाता लेकिन सिंह बिरादरी के कारण मुख्यमंत्री से नजदीकियां और अभिषेक सिंह से भातृनुमा दोस्ताना परिक्रमा पर ब्रेक लगाए हुए हैं, गर इसबार टिकट नहीं मिला तो ब्रेकफेल हो सकता है | पार्टी को इसबार उन्हें टिकट से वंचित कर आजमा लेना चाहिए तब तक साहू लॉबी को साधने के लिए इस बार कल्याणी बेहतर होंगी | पार्टी ये तो समझ रही है कि सौरभ की विशेषताओं के सामने इस तर्क में ज्यादा दम नहीं है

कल्याणी का उभरना कांग्रेस के वर्तमान विधायक चुन्नीलाल साहू के जातिगत समीकरण में बड़ी दरारें लाकर भाजपा को मजबूत करता दिख रहा है | इसलिए कल्याणी को रेस में लगातार बनाए रखने की रणनीति भी भाजपा ने अपना रखी है | सौरभ के लिए ये रणनीति परेशानी का कारण है वैसे उन्हें लगातार संबल तो मिल ही रहा है क्योंकि जन संपर्क जारी है और पुराने संबंध फिर सींचे जा रहे हैं | इस बीच जांजगीर-चांपा से बीस वर्षों से प्रत्याशी नारायण चंदेल भी अकलतरा में अपनी दावेदारी के सूत्र खंगाल चुके हैं 

भाजपा महामंत्री प्रशांत सिंह के चंदेल खेमे में आने के बाद से ये कोशिशें गुपचुप तरीके से लगातार की जाती रही है, प्रशांत अकलतरा की दावेदारी छोड़ जांजगीर चांपा लौट चुके हैं पर अपने रिसर्च का पूरा लाभ नारायण चंदेल को देते रहे हैं , बताया जाता है कि इसके लिए चंदेल ने सीमावर्ती गांवो के पुराने भाजपाइयों की बैठकें भी की हैं | लेकिन अब उपर संगठन में कमजोर पकड़ इस राह का रोड़ा हैं साथ ही नये मानदंड भी उन्हें उम्मीदवारी से बाहर ही रख रहे हैं |युवा चेहरे के रुप में सौरभ जवाहर दुबे भी अकलतरा में पदार्पण कर चुके हैं लेकिन जवाहर दुबे नयी भाजपा की रणनीति से तालमेल शायद ही बैठा पायें| कुल मिलाकर सौरभ दिनेश या कल्याणी ही मुख्य तौर पर इस लिस्ट में अंत तक बने रहने का दमखम रखते दिख रहे हैं | इनके दावों के दौर भी जारी है | लेकिन उद्योगों के निर्माण, सडको, बिजली और प्रदूषण को लेकर भाजपा नेताओं की कारगुजारियां आम जनता के दबे आक्रोश को साध ना पाये तो भाजपा फिर मात खा सकती है | पन्द्रह साल की सत्ता में हाथ बांधे दूसरे नेताओं के पीछे घूमते पार्टी प्रत्याशियों को देखकर जनता निराश है | उद्योग स्थापना की जन सुनवाई और शहर गांव के बीच से कोयले की कालिख से आंगन को रंगते वाहनों पर रोक के लिए प्रशासनिक अधिकारी के समक्ष भाजपा नेताओं की बेचारगी देख रही जनता का मिजाज भांपना जरुरी है |

 

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