कांग्रेस – भाजपा दोनों बदल सकती है चेहरा

नित नये समीकरण से हलाकान उम्मीदवार 

मुख्यालय की सीट तय करेगी चुनावी मिजाज

जांजगीर चांपा विधानसभा जातिवाद सहित समस्त ध्रुवीकरण के मानकों से दूर ही रही है यहाँ का मतदाता हर चुनाव में अलग ही मिजाज से वोट करता है | सबसे बड़ी बात है कि वोट के पहले ये जाहिर करने में भी गुरेज नहीं करता कि किसको जीत मिल रही है | जिले में सबसे मुखर और सीधा सपाट ठोस फैसला लेने वाला मतदाता इसी विधानसभा में है, जब बाकि के विधानसभाओं में मतदाता खामोशी ओढ़े चुनावी फिजा में हर दल को उम्मीदें देता रहता है, यहां दो तीन पहले ही जनमत का अनुमान निरपेक्ष व्यक्ति लगा सकता है | इसी मिजाज के चलते दोनों प्रमुख पार्टियों की गुप्त सर्वे टीम और नेताओं पर्यवेक्षकों की चर्चा में यह स्पष्ट हो गया कि जनता पिछले बीस वर्षों से चले आ रहे चेहरों से आजीज आ गई है और “कुछ और दिखाओ” के मूड में है | लोकवाणी को मानते हुए कांग्रेस और भाजपा दोनों ही प्रत्याशी चयन में बदलाव की हर संभावना  तलाश रही हैं |

कुर्मी या ओबीसी बाहुल्य का मिथक

जांजगीर चांपा विधानसभा के मतदाताओं ने राजनीतिक दलों के वोटों के ध्रुवीकरण के हर सिद्धांत को बुरी तरह पछाड़ा है, कभी ये सीट ब्राह्मण सीट कहलाती थी अब जिस पर पिछले लगभग ४० सालों से ओबीसी वर्ग का कब्जा है | यह सीट ओबीसी सीट समझी गई तो बलिहार सिंह विजयी हो गये, जब भाजपा इसे कुर्मी बाहुल्य समझकर नारायण चंदेल को सामने लाती है तो मोतीलाल देवांगन बड़ी मार्जिन से जीत दर्ज करते हैं, भाजपा पूरनमल अग्रवाल को भी आजमा चुकी है तो कांग्रेस ने चरणदास महंत और उसके बाद मोतीलाल देवांगन को लगातार टिकट दिया है जिनका महंत या देवांगन समाज अन्य पिछड़े वर्गों की संख्या से तुलना  बेहद कम ही रहा है | इन सब आंकड़ों से कांग्रेस और भाजपा दोनों को समझ आ गया है कि इस विधानसभा में जाति या वर्ग या हिन्दूवाद जीत की गारंटी नहीं है |दोनों ही दल विचार शून्यता से निकल कर नया चेहरा आजमाना चाहते हैं ताकि छत्रपों की गुटबंदी की राजनीति के तानेबाने को तोड़ा जा सके |

चुनौती चतुष्कोणीय संघर्ष की

इस क्षेत्र के लिए अभी तक सिर्फ आम आदमी पार्टी ने संजय शर्मा के रुप में प्रत्याशी घोषित किया है |आप के इस कदम ने कांग्रेस भाजपा के साथ बसपा को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है | अनुमान यह है कि बसपा ओबीसी उम्मीदवार का मन बना रही है, बसपा में कई उम्मीदवार हैं जो इस वर्ग से हैं, पिछले चुनाव में अमर सिंह राठौर ने बसपा को २४ हजार वोटों के पार पहुंचा दिया था, इसके अलावा हर बार टिकट वितरण में बसपा नये प्रयोग करती रही है इस बार जोगी कांग्रेस से गठजोड़ से और मजबूती मिल रही है और वोटों का आंकड़ा ३५ हजार के पार जा सकता है | ऐसे में भाजपा और कांग्रेस भी युवा या लोकप्रिय नये चेहरे की तलाश में हैं |

छत्रपों के साये से निकलती पार्टियां

दो दशकों से विशेष चेहरों के भरोसे उतरती भाजपा व कांग्रेस इस बार कार्यकर्ताओं पर भरोसा जताने को तैयार दिख रही है | ये संकेत दोनो ही तरफ हैं जबकि संगठन की ओर से भी सिंगल नाम के बजाय नामों के पैनल दिये जाने की चर्चा है | यहां इन सेनापतियों के सिपहसालारों के ही नाम मजबूती से आगे आ रहे हैं | कांग्रेस में मोतीलाल देवांगन के साथ पैनल में शशिकांता राठौर के नाम की चर्चा है तो नारायण चंदेल के साथ भाजपा के जिला महामंत्री प्रशांत सिंह ठाकुर का नाम संगठन ने आगे बढ़ाया है |

कांग्रेस में कभी देवांगन के खास रहे राजेश अग्रवाल भी टिकट के मजबूत दावेदार हैं, जबकि टिकट के लिए जिलाध्यक्ष का पद छोड़ चुके दिनेश शर्मा का दावा भी आलाकमान तक पहुंच चुका है , इसके अलावा सबसे ज्यादा आत्मविश्वास में प्रदेश कांग्रेस के सचिव रवि पांडेय नजर आते हैं, जो धुआंधार जनसंपर्क और पार्टी के हर नये प्रयोग को सबसे तेज गति से चलाकर चर्चा में हैं | उनकी भरी गुटबाजी में एकला चलो रे और अन्य आला दर्जे के नेताओं से सीधा संवाद की रणनीति कारगर सिद्ध होती भी दिख रही है |इन सबके साथ पीसीसी अध्यक्ष के पिता के गुप्त कहे जा रहे सार्वजनिक हुए प्रवास के बाद चर्चा में आई जिप सदस्य ज्योति किशन भी अच्छी खासी तवज्जो बटोर रही हैं |

दूसरी ओर भाजपा में अमर सुल्तानिया भी अंत तक जुझने के मूड में हैं, पीएम के प्रवास के बाद वे अंतर्राज्यीय स्तर तक चर्चा में हैं |व्यास नारायण कश्यप पार्टी की नजर में नारायण चंदेल के स्वाभाविक उत्तराधिकारी माने जाते हैं पर नंदनी राजवाड़े का तेजी से उभरना और कईयों को पीछे छोड़ देना भी नयी गतिविधियों में एक है, भाजपा के पास राजनीति से इतर निरंजन गुप्ता के रुप में नया चेहरा भी है, उनका नाम सियासी हलकों में इसलिए भी तेजी से पसंद किया जा रहा है क्योंकि वे आरएसएस बैकग्राउंड से हैं तथा अमित शाह की पालिटिक्स को सुट करते हैं | भाजपा ऐसे चेहरों पर दांव खेलने से गुरेज नहीं करती, गुटबाजी से त्रस्त कार्यकर्ता ऐसे नामों को जल्दी एक्सेप्ट भी कर लेते हैं इसके अलावा निरंजन गुप्ता शहरी संपन्न ओबीसी वर्ग से हैं जो भाजपा के परंपरागत शहरी मतदाताओं को भी लुभा सकते हैं | यह दमखम जनपद अध्यक्ष पुष्पेन्द्र सिंह भी रखते हैं | वे भी गुटबाजी से दूर सरकार के जनहित के कार्यों में ब्लॉक को टॉप पर रखने में सफल हुए हैं | सांसद गुट से कार्तिकेश्वर स्वर्णकार सोनी बाहुल्य चांपा से बेहतर पसंद हो सकते हैं , प्रदीप नामदेव का नाम जिलाध्यक्ष की रेस में सहसा टॉप पर पहुंचा था, पूर्व नपाध्यक्ष चांपा से सबसे मजबूत दावेदार हैं, इनका नाम फिर अचानक आकर तहलका मचा सकता है | सोशल मीडिया में कमल देवांगन भाजपा प्रत्याशी के रूप में घोषित हो चुके हैं ये दीगर बात है कि वही लिस्ट लगभग सभी चर्चित नामों के साथ भी वायरल हुई है | इन सबके बीच भाजयुमो से शिखा शर्मा का नाम भी चर्चा में है |डॉ संतोष मोदी की सक्रियता भी उन्हें इस पंक्ति में खड़ा करती है | कई मौकों पर अपने संबंधों के चलते वे अन्य दावेदारों को अचंभित भी करते हैं |

ये वो फेहरिस्त है जो चर्चा में है पर इन दलों ने अक्सर अप्रत्याशित नाम भी दिये हैं, मसलन आज से बीस वर्ष पूर्व चंदेल और देवांगन भी अप्रत्याशित ही रहे थे | दोनों ने अपने दलों में नये ट्रेण्ड सेट किए थे, इस बार फिर से वही संभावना बन रही है क्योंकि बीस वर्षों में पीढ़ियों में बदलाव आ गया है

बदलते हालातों के मद्देनजर प्रत्याशी चयन पर रोज नया समीकरण सियासी रुचि रखने वालों को परोसा जा रहा है | चर्चा का मुख्य विषय हार जीत फिलहाल नहीं है सारी उत्सुकता इस बात की है कि मोतीलाल देवांगन और नारायण चंदेल फिर आमने सामने होंगे या चुनावों में नयी जान फूंकने कांग्रेस – भाजपा नया प्रत्याशी लायेगी

 

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